आज भी तीर्थंकर पैदा हो सकते है किन्तु वे पैदा होने से डरते है कि अगर किसी ने गर्भपात करवा लिया तो मेरी हत्या हो जाएगी- मुनि प्रसन्नसागर
Tuesday, 24/4/2018 | 8:58 UTC+0
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आज भी तीर्थंकर पैदा हो सकते है किन्तु वे पैदा होने से डरते है कि अगर किसी ने गर्भपात करवा लिया तो मेरी हत्या हो जाएगी- मुनि प्रसन्नसागर

जन्मकल्याणक का अर्थ पुनः मां के गर्भ में नही आना है -मुनि प्रसन्नसागर

जन्मकल्याणक का अर्थ पुनः मां के गर्भ में नही आना है -मुनि प्रसन्नसागर
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जयपुर। जनकपुरी ज्योतिनगर स्थित दिगम्बर जैन मन्दिर में सहस्त्रकूट जिनालय में स्थित 1008 मूर्तियों एवं 4 नयी प्रतिमाओं का भव्य पंचकल्याणक समारोह के दूसरे दिन अमरूदों के बाग में महोत्सव स्थल पर सम्पूर्ण विधि विधान के साथ संगीतमय यागमण्डल विधान पूजन हुआ।
दोपहर में भगवान की  माता   बनने का सौभाग्य लेने वाली पुण्यषाली अनिता बिन्दायका की गोद भराई  की रस्म में लगभग 150 महिलाओं ने गोद भरी। शाम को सोलह स्वप्नो की झांकी सजायी गयी जिसमें प्रत्येक स्वप्न दर्शन का फलादेश संगीतमय नाटिका के माध्यम से बताया गया।

जन्मकल्याणक का अर्थ पुनः मां के गर्भ में नही आना है – मुनि प्रसन्नसागर

अन्तर्मना मुनि प्रसन्नसागर ने  कहा कि जन्मकल्याणक का अर्थ है कि पुनः मां के गर्भ में नहीं आना। जन्म का कल्याण तभी संभव है जब पुर्नजन्म से मुक्ति मिल जाए। कल्याण यानि किनारा, जीवन का ऐसा किनारा जिसे पा लेने के बाद अन्य कोई वस्तु पाने की मन में इच्छा ही न रह जाये।
माॅ का वात्सल्य और समर्पण अभूतपूर्व और बेमिसाल है। नारी की स्तुति तो हजारों हजार ज्ञानी आचार्यो व ऋषियों तक ने की है। उस स्तुति में मां की ममता, माॅ का वात्सल्य और उसके समर्पण को अभूतपूर्व व बेमिसाल बताया है। तीर्थंकर जैसी पवित्र आत्माओं को जन्म देने के बाद तो वह मानो धन्य ही हो गई है। यूं तो इस काल में तीर्थंकरों का जन्म नहीं होता है। आज भी तीर्थंकर पैदा हो सकते है किन्तु वे पैदा होने से डरते है कि अगर किसी ने गर्भपात करवा लिया तो मेरी हत्या हो जाएगी।
मां कैसी भी हो, उसका रंग, रूप कैसा भी हो, लेकिन बेटों को अपनी मां सुंदर लगती है, मां के उपकार संतान पर इतने है जिन्हें शब्दों मेे कह पाना संभव नही है।
भारतीय संस्कृति में कहा है मातृदेवो भवः, पितृ देवो भवः आचार्य देवो भवः, अतिथि देवो भवः। माता को देव कहा है क्योंकि वह जन्म से ही लाड प्यार करती है, वहीं सब कुछ देती है जिससे षिषु का जीवन पल्लवित और पुष्पित होता है। लेकिन आज की तथाकथित संताने अपने  मां-बाप के बुढापे में उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतर पाती है यह चिन्ता और चिन्तन का विषय है। अपने जीवन में परिवर्तन लाना ही पंचकल्याणक का उद्देष्य जो पाप कल कर सकते हो वह आज मत करों। घर के बाहर घोडे की नाल लगाने से सपनों का क्रियान्वयन नहीं होगा। उस घोडे की नाल को अपने पैरो मे लगाओं ताकि उसके क्रियान्वयन के लिए दौड सकों। तीन पाप मत करो। पहला जीते जी बुजुर्गो को वृद्धाश्रम मत भेजो, दूसरा धर्म का पैसा मत खाओ और तीसरा, अपने समाज को कभी कंलकित मत होने देना। इसके अलावा मुनि प्रसन्नसागर ने दो संकल्प भी दिलाए….एक, जो पाप कल कर सकते हो वह आज मत करो और जो धर्म कल कर सकते हो वह आज करलो….इससे धर्म महक जाएगा।

विशेष संगीतमय आरती व आओ झुला झुलाएं कार्यक्रम
समन्वयक ज्ञान चन्द जैन ने बताया कि सायंकाल कल विशेष संगीतमय आरती का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद  विशेष पालने में भगवान के जन्म की खुषियां मनाते हुए सभी महिलाएं आओं झुला झुलाएं संगीतमय कार्यक्रम में भगवान को झुला झुलाएंगी।

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